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Dhyan - ध्यान 2

जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज

 

सुन्दरसाथजी ! पूर्व लेखमें ध्यानके सम्बन्धमें संक्षिप्त प्रकाश डालनेका प्रयत्न किया गया था । आप सभीको विदित ही है कि यह विषय अत्यन्त गहन एवं मार्मिक है । इसका जितना चिन्तन किया जाय वह अल्प ही माना जाएगा । इस आलेखके माध्यमसे भी हम ध्यानको और समझनेका प्रयत्न करेंगे ।
 
ध्यानके लिए बल पूर्वक प्रयत्न करनेकी अपेक्षा प्रेमपूर्वक प्रयत्न होना चाहिए । सर्वप्रथम श्री राजजीके चरणोंंके दर्शन करें । ये चरण इतने कोमल हैं कि उनका वर्णन ही नहीं हो सकता । इनके दर्शन मात्रसे ही परम तृप्तिका अनुभव होगा । यदि उनके स्पर्शका अनुभव करेंंगे तो अंग प्रत्यंग पुलकित होंगे । श्री श्यामाजीके चरण भी इसी भांति अति कोमल एवं अति सुन्दर हैं । इन चरणकमलोंके नख मोतियोंकी भांति चमक रहे हैं । महामति श्री प्राणनाथजीने इन चरणोंको आत्माके जीवनके रूपमंे वर्णन किया है । वे कहते हैं,
प्रथम लागूं दोऊ चरण को, धनी ए न छोडाइयो छिन ।
लांक तली लाल एडियां, मेरे जीव के ऐही जीवन ।।
इन पांव तले पड़ी रहूं, धनी नजर खोलो बातन ।
पल न बालूं निरखूं नेत्रे, मेरे जीवके एही जीवन ।।
                                          (सागर ६/,)
 
ये चरण आभूषणोंके बिना भी अति सुन्दर हैं । समान्यतयामा आभूषणोंसे शोभा और अधिक बढ़ जाती है किन्तु ये आभूषण श्री राजश्यामाजीके चरणोंकी शोभासे सुशोभित हैं । श्री राजश्यामाजीके द्वारा ही उनके आभूषणोंकी शोभा बढ़ती रहती है । इसलिए ये वस्त्र एवं आभूषण पल-पलमें नूतनता धराण करते हैं । देखते देखते ही इनकी आकृति एवं रंगोंमें नवीनता दिखाई देती है । इसी प्रकार श्री राजजी एवं श्री श्यामाजीकी सम्पूर्ण शोभा समझनी चाहिए ।
 
सर्वप्रथम चरणोंके दर्शन करने होते हैं इसलिए चरणोंकी शोभाका लेशमात्र वर्णन किया है वास्तवमें सभी अंगोंकी शोभा एक दूसरेसे बढ़कर है । जिन अंगोंके दर्शन करेंगे वे इतने सुन्दर हैं कि वहाँसे दृष्टिको हटाना कठिन होता है । चरणोंसे आरंभ कर मस्तक पर्यन्त शनैः शनैः दर्शन करने चाहिए । कहा भी है,
पहले अंगुरी नख चरण, मस्तकलों कीजे वरणन ।
सब अंग वस्तर भूषण, शोभा जाने आत्माके लगन ।।
 
सुन्दरसाथजी ! आप यह न समझें कि एक ही साथमें पूरे दर्शन हो जायेंगे । यह तो संभव ही नहीं है क्योंकि श्री राजजीका पूर्ण स्वरूप इस नश्वर शरीरके मस्तिक या हृदयमें समा ही नहीं सकता है । अन्तःकरण एवं हृदय जितने निर्मल हो उसीके आधार पर श्री राजजीके स्वरूपकी स्पष्टता दिखई देगी । आरंभमें तो एक अंगकी शोभा भी दिख जाय तो भी स्वयंको कृतकृत्य समझें । चेतन एवं अचेतन मन नितान्त निर्मल होने पर ही श्री राजजीका स्वरूप स्पष्ट दिखने लगेगा । ज्ञानी एवं योगीजन परमात्माके स्वरूपकी एक झलक पानेके लिए आजीवन साधना करते हैं ऐसेमें प्रेमीजन सदैव उस स्वरूपके दर्शन करते रहते हैं । किसको कितनी स्पष्टता दिखानी है वह तो श्री राजजी पर ही निर्भर रहता है । वे चाहे वैसा कर सकते हैं किन्तु इस मायामोहके अन्तर्गत उनका पूर्ण स्वरूप दिख जाय यह तो संभव हो नहीं है । जिस प्रकार उच्च गुणवतावाली फोटो कम स्मृति वाले उपकरणमें स्थापित नहीं हो सकती उसके लिए मूल फोटाका आकार और गुणवत्ताको घटाना आवश्यक होता है उसी प्रकार श्री राजश्यामाजीका पूर्ण स्वरूप मनुष्यकी स्मृति पटलमें उसी रूपमें कदापि अंकित नहीं हो सकता । जिस प्रकार मूल फोटोको हजारों गुना कम गुणवत्ता वाला बनाकर सामान्य उपकरणमें स्थापित किया जाता है तथापित सामान्यजनको इसका ज्ञान नहीं होता है उसी प्रकार समझें कि श्रीराजजी भी अपने स्वरूपको मनुष्यकी योग्यताके अनुरूप बनाकर उसे दर्शन देते हैं । चाहे जितनी भी स्पष्टता क्यों नहोे किन्तु श्रीराजजीके स्वरूपके दर्शन होना सामान्य बात नहीं है । निर्मल हृदय वाले प्रेमी व्यक्ति ही यह सो भाग्य प्राप्त कर सकते हैं । सभीके लिए यह सुलभ नहीं है । निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराजको जितने स्पष्ट दर्शन हुए हैं उस रूपमें कभी भी किसीको भी नहीं हुए । श्री राजजीके दर्शनको सामान्य फोटीकी भांति न समझें । सामान्य फोटोको तो समूहमें बैठे हुए अनेक लोग एक साथ देख सकते हैं किन्तु श्री राजजी तो समूहमें बैठे हुए लोंगमेंसे जिसको अपना स्वरूप दिखाना चाहते हैं उसको ही दर्शन देते हैं । उस समय दूसरोंको कुछ भी पता नहीं चलता है ।
 
वीतकका यह प्रसंग आप सभीको ख्याल ही होगा कि एक दिन श्री राजजीने दर्शन देकर माता लीलाबाईको कहा, चलो परमधाम ! मैं तुम्हें लेनेके लिए आया हूँ । माता लीलाबाई सद्गुरुकी आज्ञा प्राप्त करने पर ही सभी कार्य करती थी इसलिए उन्होंने श्री राजजीको कहा, हे धामधनी ! एक बार मैं सद्गुरुको पूछ लूं तत्पश्चात् मैं आपके साथ चलूंगी । तब श्रीराजजीने कहा, मैं कल इसी समय आऊंगा तुम सब कुछ पूछकर अपनी तैयारी कर लेना । माता लीलाबाईने सद्गुरुसे इस घटनाकी चर्चा की और श्री राजजीके साथ जानेकी आज्ञा माँगी । तब सद्गुरुने कहा, श्री राजजीसे पूछना कि बच्चोंके लिए क्या व्यवस्था की है, वह बताकर तुम उनके साथ जा सकती हो । दूसरे दिन जब श्रीराजजी लेनेके लिए आए तब माता लीलाबाई सद्गुरुके निकट बैठी थी । उन्होंंने सद्गुरुने जो पूछा था वह बात श्री राजजीको बतायी । उस समय श्री राजजीने कहा, बच्चोंकी पूरी व्यवस्था हो गई है, उनकी चिन्ता करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है । तब सद्गुरुने कहा, अब तुम श्रीराजजीके साथ जा सकती हो । उस समय सद्गुरुने माता लीलाबाईको कहा, श्रीराजजी तुम्हारे समक्ष खड़े हैं उनका आभास सुन्दरसाथको भी करवा दो । तब माता लीलाबाईने श्रीराजजीके जामाकी छोर पकड़ कर सुन्दरसाथसे कहा, देखो ! श्रीराजजी यहाँ पर खड़े हैं, मैंने उनका दावन पकड़ रखा है । उस समय मात्र माता लीलाबाईको ही श्रीराजजी दिखाई दे रहे थे । दूसरे कोई भी उनके दर्शन नहीं कर पा रहे थे ।
 
यह घटना सामान्यसी लगती है किन्तु सामान्य नहीं है । इसमें बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है । एक तो इस घटनासे श्रीराजजीका सामर्थ्य स्पष्ट होता है कि वे जो चाहे वह कर सकते हैं अर्थात् वे जिसको दर्शन देना चाहें उसीको उनके दर्शन होंगे । दूसरी बात माता लीलाबाई कोई ज्ञानी महिला नहीं थी । उनमें यह विशेषता थी कि वे सद्गुरुके प्रति पूर्णतः समर्पित थी । इससे यह फलित होता है कि सद्गुरुके प्रति पूर्ण विश्वास हो तो भी श्रीराजजीके दर्शन हो सकते हैं । किन्तु यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य है कि महामति श्री प्राणनाथजीने सद्गुरुके जो लक्षण बताये हैं वैसे लक्षणोंसे सम्पन्न सद्गुरुमें ही यह विशेषता होगी । आजकल अपना महत्त्व बढ़ानेकी लालसा वाले स्वयंभू सद्गुरुमें ऐसी विशेषता नहीं होगी ।
 
ध्यान करते हुए सर्वप्रथम श्रीराजजीके एक अंगको देखनेका प्रयत्न करें । एक साथ पूरे स्वरूपके दर्शन नहीं हो सकते हैं । किसी न किसी अंगकी झलक दिखने पर हमारा उत्साह और बढ़ेगा । जैसे-जैसे आतुरता बढ़ती जायेगी वैसे-वैसे अनुभव बढ़ता जायेगा । इस प्रकार बढ़ते जायेंगे तो श्रीराजजीके प्रति प्रेम भी बढ़ता जाएगा और आपको अहर्निश उनके साहचर्यका अनुभव होने लगेगा । इस प्रकार प्रगति होती रहेगी और श्रीराजजीका स्वरूप स्पष्ट दिखने लगेगा । यह कपोल कल्पना नहीं अपितु यथार्थ है । किन्तु जो लोग इस दिशामें आगे बढ़े नहीं हैं और जिनको दृढविश्वास नहीं है उनको तो ये बातें कल्पनामयी लगने लगेगी । यह सुनिश्चित है कि अंहकारके रहते हुए कभी भी श्रीराजजीका अनुभव नहीं होगा । इसीलिए कहा गया है कि ज्ञानियोंको परमात्माका अनुभव नहीं होता है । क्योंकि उनको संसारका ज्ञान है, संसारके नियमोंका ज्ञान है परन्तु परमात्माके प्रेमका ज्ञान नहीं है । जो परमात्माको ही जानता है ऐसे प्रेमीको ही परमात्मा दिखते हैं । कहा भी है,
प्रेम गली अति साकंरी, यामें दोय न समाय ।
 
प्रेमी व्यक्ति दुनियांके लिए पागल लगने लगेगा । क्यों न हो वह तो परमात्माके प्रेममें पागल ही है । लौकिक वस्तुओंके पीछे पागल बने हुए लोगोंको भी अपनी सुधि नहीं रहती है तो परमात्माके पीछे पागल बने हुए व्यक्तिको अपनी सुधि कैसे रहेगी । किन्तु परमात्मा उससे कोई बूरे कार्य होने नहीं देंगे । उसकी भूल भी भूल नहीं अपितु लोक कल्याणकारी कार्यके रूपमे परिणत होगी ।
 
अनेक लोग किसी व्यक्तिकी बाह्य सुन्दरता एवं बाह्य हावभावकी ओर आकृष्ट होते हैं । किसीकी सुन्दर आकृति ऐसे लोगोंके मनको अनायास खींच लेती है । इसी प्रकार किसीकी भीतरकी सुन्दरता अर्थात् अन्तःकरणकी पवित्रता छल कपट रहित सरल स्वभाव भी लोगोंको अपनी ओर आकृष्ट करनेमें सक्षम होता है । परमात्मा तो बाहर एवं भीतर दोनों ओरसे सुन्दर हैं । क्या वे हमें अपनी ओर नहीं खींचेगे ? अवश्य खींचेंगे किन्तु उनकी सुन्दरताको देखने पर ही हम उनकी ओर खींचे जायेंगे । इसलिए हमें सर्वप्रथम उनकी सुन्दरताको देखना होगा । वास्तवमें ध्यान परमात्माकी सुन्दरताको देखनेके लिए है । किन्तु हम हृदयमें विकारोंको भर कर उनकी ओर दौड़ना चाहते हैं इसलिए हमारी साधना निष्फल हो जाती है; हमारा ध्यान लक्ष्यहीन हो जाता है ।
 
ध्यानके सन्दर्भमें एक और बात भी मननीय है । वह है श्रीराजजीका मार्गदर्शन, उनसे वार्तालाप । ध्यानमें श्रीराजजीसे वार्तालाप भी संभव है । किन्तु यह तभी संभव होगा जब हम उनके वचनोंको सुननेके लिए सक्षम होंगे । यह भी हृदयकी निर्मलता, समर्पण भाव एवं निश्छल प्रेमकी निरन्तरता पर निर्भर होगा । श्रीराजजी तो हमें सदैव अच्छा मार्ग बतायेंगे, अनिष्टोंसे बचायेंगे, हमारे साथ-साथ लोकका भी कल्याण करेंगे । किन्तु हमारा ध्यान बंटा हुआ होता है । जिससे हम उनका मार्गदर्शन भी समझ नहीं पाते हैं, उनसे वार्तालापकी तो बात ही दूर रही । क्या सद्गुरुने श्रीराजजीसे वार्तालाप नहीं की थी ?क्या महामति श्री प्राणनाथजीने श्रीराजजीसे वार्तालाप नहीं की थी ?
अवश्य की थी । श्री तारतम सागरमें अनेक प्रसंग ऐसे हैं जहाँ महामति श्री राजजीसे वार्तालाप करते हुए दिखाई देते हैं ।
 
सिन्धी ग्रन्थका विरह और उपालम्भ वार्तालापसे अतिरिक्त क्या हो सकता है ?
खिलवत ग्रन्थ तो पूरा वार्तालाप ही माना जा सकता है । इसी प्रकार श्री तारतम सागरमें ऐसे अनेक प्रसंगोंका उल्लेख है जहाँ निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराज श्री राजजीके साथ वार्तालाप करते हैं । वीतक भी इसके साक्षी हैं । ध्यानमें व्रजमंडलके दर्शनके समय भी श्रीकृष्णजीसे वार्तालाप हुई । नवतनपुरीमें साक्षात् दर्शनके समय भी वार्तालाप हुई । इसी अवसर पर ब्रह्मात्माओंकी जागनीका दायित्व सद्गुरुको सौंपा गया था । इस प्रकार ध्यानमें वार्तालाप संभव है और ऐसे अनेक प्रसंग उपस्थित हुए हैं ।
 
ध्यानमें श्रीराजश्यामाजीके स्वरूपके दर्शनके साथ साथ उनकी विविध लीलाओंके दर्शन भी होते हैं ।यह तो श्री राजजीकी इच्छा पर निर्भर है कि वे हमें कौन-कौनसी लीलाओंके दर्शन करवाना चाहते हैं ?
श्रीराजजी हमारी उत्कट अभिलाषाको अवश्य पूर्ण कर देते हैं । हम श्रीराजजीके प्रेममें मस्त होंगे तो भी यदा-कदा वे विभिन्न लीलाओंके दर्शन करवा देते हैं । इन लीलाओंमें परमधाम, व्रज, रास और जागनी मध्ये कोई भी संभव है । इतना ही नहीं ध्यानमें परमधामके भी दर्शन संभव है । व्रज और रासकी लीलाओंके दर्शन भी संभव है । श्रीदेवचन्द्रजी महाराजको व्रजकी लीलाओंके दर्शन एवं महामति श्री प्राणनाथजीको रासकी लीलाओंके दर्शन हुए थे यह तो वीतकोंंमें स्पष्ट लिखा है । श्रीदेवचन्द्रजी महाराज तो परमधामका वर्णन ऐसे करते थे जैसे देख कर बता रहे हैं । वस्तुतः उनको स्पष्ट दिखाई देता था । इसी प्रकार महामति श्री प्राणनाथजीको भी स्पष्ट दिखाई देता था । अन्यथा वे परमधामका इतना विशद वर्णन कैसे कर सकते थे ? इसी प्रकार स्वामी लालदास जी, ब्रह्ममुनि जुगलदासजीको भी परमधाम दिखाई देता था । परमधामके थोड़े बहुत दृश्य देखनेवाले एवं श्रीराजजीकी सामान्य झलक प्राप्त करनेवाले महापुरुष तो अनेक हुए हैं । ये घटनाएँ पूर्वकालमें ही घटती थी ऐसी बात नहीं है । यह तो आज भी संभव है । श्रीराजजीके प्रति हमारा विश्वास कम हुआ और संसारके प्रति बढ़ने लगा तभी हम स्वयंको श्रीराजजीसे दूर समझने लगे । इसलिए हमें श्रीराजजीकी बातों पर विश्वास भी कम होने लगा ।
 
सुन्दरसाथजी ! यदि हम निष्ठा पूर्वक ध्यानको आगे बढायेंगे, हमारा हृदय निर्मल होगा, अंतःकरणके विकार दूर होंगे तो हमें भी थोड़ा-थोड़ा अनुभव अवश्य होने लगेगा । जैसे ही अनुभव होने लगेगा वैसे ही हम अपनी भावनाओंको और पवित्र बनायें, श्रीराजजीके प्रति विश्वासको दृढ बनायें एवं हृदयको प्रेमसे छलका दें । तब हमें क्या-क्या अनुभव होगा, कैसे-कैसे दर्शन होंगे इसका क्या वर्णन करें ? इनका तो प्रत्यक्ष अनुभव कर जीवनको आनन्दित बनायें ।
 

Dhyan - ध्यान

 

जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज

 

 

ध्यान क्या है और वह किस प्रकार करना चाहिए इस विषयमें अनेक महानुभावोंके भिन्न-भिन्न मत हैं । कोई मनकी एकाग्रताको ध्यान कहते हैं तो कोई मनकी समग्रताको ध्यान कहते हैं । कुछ महानुभाव विचारशून्य मनस्थितिको ध्यान कहते हैं । योग शास्त्रमें इसको योगका एक साधन मान कर चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक विषयों अथवा वस्तुओंसे हटाकर परमात्माकी ओर निरन्तर लगानेको ध्यान कहा है ।
 
ध्यान योगका अन्तरंग साधन है । योगका तात्पर्य है 'मिलन' । आत्मा और परमात्माके मिलनका अनुभव होना ही योग है । चित्त कलुषित होनेसे उसकी वृत्तियां चंचल होती हैं और भौतिक पदार्थोंकी ओर दौड़ती रहती हैं जिसके कारण किसी न किसी प्रकारके दुःखका अनुभव होता रहता है । ऐसेमें विषयोंकी ओर उन्मुख वृत्तियोंको रोक कर परमात्माकी ओर लगाने पर ही योगका अनुभव हो सकता हैं । इसलिए महर्षि पाताञ्जलिने चित्तवृत्तियोंके निरोधको योग कहा है । यथा,
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (योग दर्शन १/२)
चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर आत्माको स्वयंका अनुभव होगा और वह स्वयंको द्रष्टाके रूपमें समझने लगेगी । इसीलिए महर्षिने कहा,
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् । (योगदर्शन १/३)
महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं, हे साधको ! तुम सर्वप्रथम स्वयंको पहचानो । स्वयंको पहचाने बिना परमात्माकी पहचान कैसे होगी ? यथा,
पेहेले आप पहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो ।
बिना आप चीन्हे पारब्रह्म को, कौन कहे मैं जान्यो ।।
(किरन्तन १/१)
 
जन्म जन्मान्तरके पाप-पुण्य कर्मोंके संस्कार चित्तमें अंकित होनेसे प्रायः मनुष्यका चित्त कलुषित रहता है । ऐसे चित्तकी वृत्तियाँ चलायमान होती हैं । भौतिक संस्कारोंके कारण कलुषित हुए चित्तकी वृत्तियाँ भी भौतिक पदार्थोंकी ओर ही आकृष्ट होती हैं जिससे चित्त और भी मलिन हो जाता हैं । जिस प्रकार हिलते हुए गन्दे जलमें अपना प्रतिविम्ब नहिवत् दिखाई देता है उसी प्रकार चलायमान वृत्तिवाले मलिन चित्तके कारण आत्माका स्वरूप भी ज्ञात नहीं हो सकता है । इसलिए सर्वप्रथम चित्तको शुद्ध करना होगा तदनन्तर उसकी वृत्तियोंको स्थिर परमात्माकी ओर लगानी होगी । तभी आत्मा और परमात्माका अनुभव होगा ।
 
महर्षि पतञ्जलिने मलिन चित्तवाले लोगोंके लिए चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय अभ्यास और वैराग्य बताया और उनकी विस्तृत चर्चा भी की । क्योंकि साधनाओंका मूल उदेश्य ही चित्तके मल (विकारों) को दूर करना है । मनुष्यका स्वभाव ऐसा बन गया है कि वह निर्मलताका ढोंग रचता है अर्थात् अन्तःकरणमें स्थित विकारोंको छिपाकर रखना चाहता है और बाहरसे शुद्धताका दिखावा करता है । ऐसे लोगोंके लिए महामति श्री प्राणनाथजीने कहा है,
अन्दर नहीं निरमल, फेर फेर नहावे बाहेर ।
कर देखाई कोट बेर, तोहे ना मिलो करतार ।।
तोलों ना पिउ पाइए, जोलों न साधे दिल ।।
                                                         (किरन्तन­­ १३२/१,२)
 
जब तक अन्दरकी शुद्धि नहीं होगी और चित्तवृत्तिको परमात्माकी ओर नहीं लगाओगे तब तक भले ही तुम बाहरी पवित्रताके अनेक दिखावे क्यों न करो किन्तु तुम्हें परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी । तुम जिस प्रकार बाहरसे शुद्ध, पवित्र एवं भले होनेका दिखावा करते हो यदि सचमूच अन्दरसे शुद्ध, पवित्र एवं भले बन जाओगे तब तुम्हें परमात्माकी अनुभूतिके लिए क्षणमात्रका भी समय नहीं लगेगा, तुम सदैव परमात्मामें ही रमण करते रहोगे । यथा,
जैसा बाहेर होत है, जो होवे ऐसा दिल ।
तो अधखिन पिउ न्यारा नहीं, माहें रहे हिलमिल ।।
                                                              (किरन्तन १३२/४)
 
महर्षि पतञ्जलिने पदार्थोंसे प्राप्त सुखोंका उपभोग एवं स्वर्गादि लोकोंके सुखोंका उपभोग करनेकी चाहना रहित होनेको अपर वैराग्य एवं परमात्माका समझकर अथवा परमात्माकी ओर आकृष्ट होकर प्रकृतिजन्य गुणोंकी ओर आकृष्ट न होनेको पर वैराग्य कहा है । वास्तवमें वैराग्यका तात्पर्य है कि भौतिक वस्तुओंके प्रति अनुरागका समाप्त होना एवं परमात्माके प्रति रागका उदय होना । इसीको विगत राग (भौतिक पदार्थोसे राग हट जाना) एवं विशिष्ट राग (परमात्माकी ओर राग होना) कहा गया है । विभिन्न साधनाओंके निरन्तर अभ्यास और वैराग्यके द्वारा सामान्य व्यक्ति भी चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक जगतसे हटाकर परमात्माकी ओर लगा सकता है । ऐसे लोगोंके लिए चित्तवृत्तिनिरोधका उपाय अभ्यास और वैराग्य कहा गया है । यथा,
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः । (योगदर्शनः १/२)
अभ्यास और वैराग्यसे उसका निरोध हो सकता है ।
 
किन्तु जन्म-जन्मान्तरके शुभ संस्कारोंके द्वारा जिनका अन्तःकरण निर्मल हो चुका होता है ऐसे श्रेष्ठ साधकोंको दीर्घकालीन साधनाकी ओर जानेकी आवश्यकता नहीं रहती है । उनके लिए अति सरल साधना है 'प्रेम' महर्षि पतञ्जलिने पर वैराग्यके द्वारा उसका संकेत किया है । ऐसे व्यक्ति परमात्माके प्रति स्वयंको समर्पित कर, परमात्माकी शरणमें रह कर अपनी चित्तवृत्तियोंको भौतिक आकर्षणोंकी ओर जानेसे रोक सकते हैं और उनको परमात्माकी ओर लगाकर परमात्माके प्रेममें मस्त रह सकते हैं । ऐसे श्रेष्ठ साधकोंके लिए चित्तवृत्तिनिरोधका विशेष उपाय बतलाते हुए महर्षि कहते हैं,
ईश्वरप्राणिधानाद्वा (योग दर्शन १/२३)
उच्च कोटिके साधक परमात्माके प्रति समर्पित होकर अपनी चित्तवृत्तिका निरोध कर सकते हैं ।
 
विभिन्न शास्त्रोंमें साधकोंकी योग्यताके आधार पर साधनाके मार्ग दो प्रकारके बतलाये हैं । वे हैं, (१) पिपीलिका मार्ग और (२) विहंगम मार्ग । इनमें पिपीलिका मार्ग वह है जिसके द्वारा दीर्घकाल पर्यन्त निरन्तर साधना करता हुआ साधक परमात्माकी अनुभूति कर सकता है । इस मार्गमें विघ्नबाधायें भी अनेक आती हैं और किसी कारणवश साधनामें विपेक्ष पड़ा तो जन्म-जन्मान्तर पर्यन्त भी प्रयत्न करना पड़ सकता है । तथापि सभी साधकोंको सफलता प्राप्त नहीं होती है । क्योंकि अनेक परिस्थितियोंका सामना करता हुआ साधक कभी न कभी पथभ्रष्ट हो सकता है । इसीलिए ऐसे मार्गको पिपीलिका मार्ग अर्थात् चीटियोंका-सा मार्ग कहा है ।
 
दूसरा मार्ग है विहंगम मार्ग अथवा पक्षियोंका-सा मार्ग । जिस प्रकार पक्षी अपने पंखोंकी सहायतासे उड़कर लम्बी दूरी भी तत्काल तय कर लेता है जबकि चीटियोंको उतनी दूरी तय करनेमें अनेकों जन्म पर्यन्त निरन्तर यात्रा करनी पड़ सकती है, तथापि अनेकों विघ्नबाधाओंके चलते सभी चीटियाँ गन्तव्य पर्यन्त पहुँच नहीं सकती है, इसी प्रकार पिपीलिका मार्गसे चलनेवाले सभी साधक परमात्मा तक नहीं पहुँच सकते हैं । श्रीमद्भगवद्गीतामें श्री कृष्णजीने भी यही बात कही है,
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चित् मां वेत्ति तत्तवतः ।।
                                                                   (गीता ७/३)
 
एक तो हजारों मनुष्योंमें कोई एक परमात्म-प्राप्तिकी साधनामें लगता है । इस प्रकार साधना मार्गमें चलने वालोंमें भी हजारोंमेंसे कोई एक ही मुझे यथार्थरूपसे जान सकता हैं ।
महामति श्री प्राणनाथजीने उक्त दोनों प्रकारके मार्गोंका निरूपण करते हुए कहा है,
पन्थ होवे कोटि कलप, प्रेम पहुँचावे मिने पलक ।।
                                                           (परिक्रमा १/५३)
 
अन्य साधनाओं (पिपीलिका मार्ग) के द्वारा परमात्मा तक पहुँचनेमें कोटि कल्प व्यतीत हो सकते हैं किन्तु प्रेमके द्वारा क्षणमात्रमें पहुँचा जा सकता हैं । क्योंकि परमात्मा तो दूर ही नहीं हैं । हम अज्ञानके आवरणके कारण उनका अनुभव नहीं कर पा रहे होते हैं और उनको दूर समझते हैं । हमारे अन्तःकरण पर अज्ञानका आवरण छाया हुआ है । तभी महामति कहते हैं,
तू आप ही न्यारी होत है, पियु नहीं तुझ से दूर ।
परदा तूं ही करत है, अंतर न आडे नूर ।।
                                                (किरन्तन १३२/५)
 
हे आत्मा तू स्वयं ही परमात्माकी ओर न देख कर संसारकी ओर देख रही हो ओर स्वयंको परमात्मासे दूर मान रही हो । वास्तवमें प्रियतम परमात्मा तुझसे दूर नहीं हैं । तुने अज्ञानका आवरण ओढ़ लिया है । उसे दूर करोगी तो तुझे अनुभव होगा कि तेरे और परमात्माके बीच कोई दूरी नहीं है ।
 
इसीलिए महामति विहंगम मार्गका उपदेश देते हैं । जैसे पक्षी अपने पंखोंकी सहयतासे उड़ान भरता है उसी प्रकार हे साधक ! तुम भी ज्ञान और प्रेमरूपी पंखोंकी सहायतासे उड़ान भरनेका प्रयत्न करो । उन्होंने तारतम ज्ञान एवं प्रेमलक्षणा भक्तिका एक साथ उपदेश इसीलिए दिया है । जब तुम्हारा हृदय ज्ञान और प्रेमसे ओतप्रोत होगा तब तुम्हें उडान भरनेकी भी आवश्यकता नहीं पडें़गी । तुम स्वयंको श्रीराजजीके साथ ही रमण करते हुए पाओगे । यथा,
ओ खेले प्रेमें पार पिया सों, देखनको तन सागर मांहि ।
                                                                (किरन्तन)
 
ऐसे साधक शरीरसे तो दुनियाँमें रहते हैं और लोक व्यवहारका काम भी करते हैं किन्तु आत्मभावसे नित्य निरन्तर पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजीके साथ प्रेमपूर्वक खेलते रहते हैं ।
महर्षि पतञ्जलिने धारणा, ध्यान और समाधिको योगके अन्तरंग साधन माना है । उनका कहना है कि चित्तवृत्तिको एक मात्र लक्ष्य परमात्मामें ठहराना धारणा है, उसको निरन्तरता प्रदान करना ध्यान है और उस समय चित्तका अपना पन मिटकर मात्र ध्येय अर्थात् परमात्माका अनुभव होना समाधि है । यथा,
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ।
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।
                                                       (योगसूत्र ३/१,२,३)
 
इससे यह स्पष्ट होता है कि परमात्माकी अनूभूतिके लिए धारणा, ध्यान और समाधि अंतरंग साधन हैं । इन तीनोंको भिन्न-भिन्न नहीं अपितु एक ही साधनकी तीन अवस्थाएँ समझनी चाहिए । दूसरे शब्दोंमें कहें तो ध्यानकी आरंभिक अवस्था धारणा है तो अन्तिम अवस्था (अथवा सफलता) समाधि है । इस प्रकार समाधि ध्यानसे भिन्न नहीं अपितु ध्यानकी उत्तम अवस्था है । इसलिए ध्यान कहनेसे धारणा ध्यान एवं समाधि तीनों ही आ जाते हैं । इसीलिए कहा गया है कि परमात्माकी अनुभूतिके लिए अति उत्तम साधन ध्यान है क्योंकि ध्यानके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंको परमात्मामें स्थिर कर देहात्मबुुद्धि, देहाध्यास अथवा मैं पनको समर्पित करने पर परमात्माकी अनुभूति होती है । यही कारण है कि उच्च कोटिके साधकों (जिनका अन्तःकरण जन्मजन्मान्तरकी साधना एवं सत्संग द्वारा निर्मल हो चुका हो) के लिए अन्य साधनाओंकी अपेक्षा परमात्माकी ओर समर्पित होने को ही श्रेयकर माना गया है । क्योंकि समर्पणसे ही समाधि सिद्ध होगी । यथा,
समाधिसिद्धिः ईश्वरप्रणिधानात् । (योगसूत्र २/४५)
 
प्रेमके बिना समर्पण संभव नहीं है । इसलिए महामति श्री प्राणनाथजीने प्रेमको सहज साधन कहा है । जिसके हृदयमें प्रेम प्रकट होता है उसके लिए यह संसार स्वप्नवत् लगेगा । वह तो निरन्तर समाधिमें ही रहता है अथवा वह जीवमुक्त हो जाता है । यथा,
उत्पन्न प्रेम पारब्रह्म संग, वा को सुपन होय गयो संसार ।।
                                                                      (किरन्तन)
 
ऐसे प्रेमी समत्वभावको प्राप्त हुए होते हैं । गीतामें समत्त्वको भी योग कहा है, समत्त्वं योग उच्यते (गीता) । उनका ध्यान लौकिक वस्तुओंसे हटकर परमात्माकी ओर ही लगा रहता है । संसारिक दुःखदायी वस्तुओंसे बने हुए सम्बन्धके विच्छेदको भी गीतामें योग कहा है,
तद्विद्याद् दुःखसंयोगवियोग योगसंज्ञितम् ।
 
                                      (गीता)
 
क्योंकि भौतिक वस्तुओंसे सम्बन्ध छूटने पर ही परमात्माके साथके नित्य सम्बन्धका अनुभव होगा । प्रेमके द्वारा यह अनुभव शीघ्र होता है । इसलिए प्रेमका महत्त्व सर्वातिशय बताया है । यहाँ तक कि प्रेमको परमात्माका ही स्वरूप मान है । महामति कहते हैं,
प्रेम ब्रह्म दोउ एक हैं ।
                                  (परिक्रमा २/....)
 
प्रेम सारे बन्धनोंको तोड़ देता है और सारे बन्द द्वारोंको खोल देता है । यथा,
प्रेम खोल देवे सब द्वार, पारके पार पियाके पार ।
                            (परिक्रमा ३)
 
दूराचारी व्यक्ति भी यदि अपने दुष्कृत्योंको छोड़कर परमात्माके प्रेममें पागल हो जाता है तो वह सारे पापोंसे मुक्त होकर परमात्माका अनुभव कर सकता है । प्रेममें जितना समर्थ्य है उतना अन्य किसीमें नहीं है । परमात्माके प्रेममें डूवा हुआ व्यक्ति जगतके भयोंसे मुक्त होकर निर्भय हो जाता है । महामति कहते हैं,
वाको आग खाग वाघ नाग न डारावे, गुण अंग इद्रीयोसे होत रहीत ।
डर सकल सांमी इनसे डरपत, या विध पाइए प्रेम परतीत ।।
                                                              (किरन्तन ९/३)
 
अनन्य प्रेमी व्यक्ति गुण अंग इन्द्रियोंसे ऊपर उठा हुआ होता है इसलिए उसको अग्नि, शस्त्र, हिंस्रक प्राणी वाघ, नाग आदि भी भयभीत नहीं कर सकते अपितु उससे प्रेम करने लगते हैं । स्वयं भय ऐसे व्यक्तिसे भयभीत होता है । हृदयमें अहिंसा भाव स्थिर होने पर भी ऐसेे व्यक्तिके समीपमें अन्य लोगोंका बैर भाव दूर होता है । कहा भी है,
अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः । (योगदर्शन २/३५)
 
प्राचीन समयमें ऋषियोंके आश्रमोंके समीप वाघ एवं हरिण साथ साथ रहते थे । यह अहिंसा वृत्तिका ही परिणाम था ।
 
उपर्युक्त समग्र कथनोंसे यह स्पष्ट होता है कि परमात्माकी अनुभूतिके लिए ध्यान मुख्य साधन है । इसमें प्रेमकी मात्रा जितनी अधिक होगी उतनी ही शीघ्र और स्पष्ट अनुभूति होगी । निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराजकी भांति निश्छल प्रेम हो तो पूर्णब्रह्म परमात्माके प्रत्यक्ष दर्शन भी हो सकते हैं । इसीलिए कहा है कि योगीजन वर्षोंकी साधनासे पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णकी छविको एक वार हृदयमें स्थित करना चाहते हैं जबकी प्रेमी गोपियाँ श्री कृष्णके प्रेममें पागल बनी हुई निरन्तर उनके साथ खेलती रहती हैं । गोपियोंकी सहज साधना प्रेम है । हमारा हृदय भी प्रेमसे भर जाय तो आज भी ऐसा अनुभव कर सकते हैं । इसके लिए शुरुआत ध्यानके द्वारा की जाती है ।
 
इस प्रकार ध्यानका महत्त्व जानने पर अब हमें यह भी जानना है कि ध्यान कैसे किया जाय अथवा ध्यानकी विधि क्या है ? इसके लिए हमें यह जानना आवश्यक है कि लौकिक साधनाओंकी भांति ध्यानकी कोई निश्चित विधि नहीं होती है । साधनाओंकी सारी विधियाँ अन्तःकरणके मलको दूर करनेके लिए हैं । विधि निषेधका सम्बन्ध द्वन्द्वोंके साथ होता है । निर्द्वन्द्व एवं नित्यसत्त्वस्थ होने पर ही ध्यान लगता है । सामान्यजन विचारशून्य स्थितिको ही ध्यान लगना समझते हैं वह तो प्रत्याहारका एक रूप भी हो सकता है और समाधिका विघ्न भी हो सकता है । यह तो एक पड़ाव मात्र है मंजिल नहीं । मंजिल तो परमात्मा ही हो सकते हैं । क्योंकि घण्टों तक ध्यान लगाने वाले व्यक्तियोंसे उनका अनुभव पूछा जाय कि क्या उन्हें उस समय परमात्माका अनुभव हो रहा था ? तब वे यही कहेंगे कि परमात्माका अनुभव तो नहीं हो रहा था किन्तु एक अलग प्रकारके आनन्दका अनुभव हो रहा था । इससे यह ज्ञात होता है कि वह परमात्माका अनुभव नहीं अपितु विचारशून्य अवस्था थी । कभी कभी ऐसे साधक शरीरके भिन्न-भिन्न चक्रोंका चिन्तन करते हुए उन चक्रोंके (विशेष कर आज्ञा चक्रके) सक्रिय होने पर इस ब्रह्माण्डके अन्तर्गत स्थित विभिन्न दृश्योंको देख सकते हैं । इस प्रकार आज्ञाचक्र खुलने पर अतीन्द्रिय दृश्य दिखाई देते हैं । कभी किसीको कुछ सिद्धियां भी प्राप्त हो सकती हैं । इतना होने परभी जो कुछ प्राप्त हुआ वह यथार्थमें लौकिक सुख ही तो है । परमात्मा तो इन सबसे भिन्न हैं । उनका अनुभव प्रेमसे ही होगा इसलिए साधकको छल कपट, रागद्वेष आदि द्वन्द्वोंको छोड़ कर हृदयमें प्रेम भरना चाहिए । इस प्रकार आगे बढ़ने पर कभी न कभी किसी न किसी प्रकारसे थोड़ा अंशमें भी परमात्मका अनुभव अवश्य होगा ।
प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय है । ब्रह्मात्माएँ अपने प्रियतम परमात्माके प्रेममें स्वयंको समर्पित करती हैं और द्वन्द्वोंसे मुक्त होकर पूर्णब्रह्म परमत्मा अनादि अक्षरातीत श्रीराजजीका अनुभव करती हैं । इसलिए ऐसा ध्यान विधि- निषेध रहित माना जाता है । कहा भी है,
द्वान्द्वातीते पथि विचरतां को विधिः को निषेधः ।
 
ध्यानके इस द्वान्द्वातीत मार्ग पर चलनेवालोंके लिए क्या तो विधि होगी और क्या ही निषेध होगा । इसीलिए शंकराचार्यजीने भी ध्यानके विषयमें कहा,
लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं,
स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलतनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम् ।
ब्रह्मात्मैक्यमुपेत्य तन्मयतया चाखण्डवृत्त्यानिशं,
ब्रह्मानन्दरसं पिबात्मनि मुदा शून्यैः किमन्यैर्भ्रमैः ।।
                                                           (विवेक चूडामणि ३७९)
 
अपने चित्तको एकमात्र लक्ष्य परमात्मामें दृढतापूर्वक स्थिर कर बाह्य इन्द्रियोंको अन्त्तर्मुख करो और देहकी स्थितिकी ओर ध्यान न देकर मात्र उसे निश्चल रखो । अब तन्मय होकर आत्मा और परमात्माके मिलनका अनुभव करो एवं आत्माके द्वारा अखण्ड रूपसे ब्रह्मानन्द रसका पान करो । हे साधक ! तुम्हें इस जगतकी भ्रमपूर्ण थोथी बातोंसे क्या लेना-देना है ?
 
सचमुच चित्तकी वृत्तियोंको भौतिक पदार्थोंकी और न दौड़ाकर श्री राजजीकी ओर प्रेमपूर्वक दौड़ाने लगेंगे तब कहीं हमारा ध्यान सफल होगा । इसलिए ऐसे ध्यानमें विधि निषेधका कोई विशेष महत्त्व न होते हुए भी प्रेमी सुन्दरसाथ कैसे और कहाँसे ध्यान करना आरंभ करें इसके लिए यहाँ पर संक्षिप्त मार्गदर्शन दिया जाता है ।
 
आप प्रातः ब्रह्म मुहुर्तमें (तीन से छः बजेके मध्य) शौच-स्नान आदिसे निवृत्त होकर पूजाकक्षमें अथवा अन्य शुद्ध स्थान पर एकान्त स्थलमें शुद्ध आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख हो कर बैठें और आँख बन्दकर चित्तवृत्तियोंको अन्यत्र न दौड़ाते हुए प्रेम पूर्वक श्रीराजजीका चिन्तन आरंभ करें । ऐसा मान लें कि श्रीराजश्यामाजी आपके सम्मुख सिंहासन पर विराजमान हैं । आप उनको प्रेम पूर्वक देखनेका प्रयत्न करें । इसके लिए आप श्रीराजश्यामाजीकी फोटोकी सहायता ले सकते हैं । श्री ५ नवतनपुरी धामसे प्रकाशित श्री राज श्यामाजीकी फोटो ध्यानके लिए ही है । आप फोटोको अपने सम्मुख रख कर पहेले खुली आँखोंसे श्री राजश्यामाजीका स्वरूप प्रेम पूर्वक भली भाँति देखें । देखते हुए ऐसा सोचें कि फोटोमें जितनी सुन्दरता है उससे करोडों गुनासे भी अधिक सुन्दर स्वरूप श्रीराजश्यामाजीका है । फिर आँख बन्दकर अन्दरकी दृष्टिसे उस स्वरूपके दर्शन करनेका प्रयत्न करें । इस समय विचारोंको कहीं न दौड़ायें । ऐसा मान लें कि श्रीराजश्यामाजी साक्षात् रूपमें आपके सम्मुख विराजमान हैं और आप प्रेमपूर्वक उनके दर्शन कर रहे हैं । चित्तकी वृत्तियाँ तो यत्र-तत्र कहीं भी दौड़नेका प्रयत्न करेंगी किन्तु आप किसी भी विषयका चिन्तन किए बिना इन वृत्तियोंको दृढ़ता पूर्वक श्रीराजजीकी और ही लगाए रखें । आप जितने प्रेमसे दर्शन करनेका प्रयत्न करेंगे आपको उतना ही अच्छा लगेगा । आधा घण्टेसे लेकर एक घण्टे तक आप प्रतिदिन निश्चित समयमें यह अभ्यास करें । यात्रामें भी निश्चित समयपर ध्यानमें बैठ जायें । ध्यानके लिए एक निश्चित आसन रखें । ध्यानके पश्चात् गर्म दूध अवश्य पीएँ । जिनका ध्यान लग जाता है उनको गर्म दूधमें घी डालकर पीना चाहिए ।
 
अन्तःकरणकी शुद्धताके आधार पर आपको अनुभव होगा । ब्रह्मात्मा होगी और उनका अन्तःकरण शुद्ध होगा अर्थात् हृदयमें छल-कपटकी भावना नहिंवत् होगी तो उनको थोड़े दिनोंके प्रयत्नमें ही अनुभव होने लगेगा । कलश हिन्दुस्थानी ग्रन्थमें सुहागिनियोंके लक्षण बताये गए हैं ऐसी निर्मलहृदया ब्रह्मात्माको तो अति अल्प समयमें ही अलौकिक अनुभव होने लगेगा और थोड़े दिनोंमें तो उन्हें श्री राजश्यामाजीकी अनुभूति ही होने लगेगी और ध्यानमें दर्शन भी होंगे । यह सब प्रेमका आधिक्य और अन्तःकरण (हृदय) की निर्मलता पर निर्भर होगा । ब्रह्मत्माओंके अतिरिक्त अन्य आत्माओंको भी निरन्तर अभ्यास और श्रद्धा एवं विश्वासकी दृढताके आधार पर न्यूनाधिक्य रूपमें अवश्य अनुभव होने लगेगा ।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सरके कारण अन्तःकरण मलिन बना हुआ होता है और चित्तकी वृत्तियाँ अति चञ्चल होती हैं । उनको श्रीराजजीकी ओर लगाना इतना सरल नहीं है । ध्यान करना आरंभ करनेसे पूर्व आप उसी आसनमें बैठकर योगमुद्रा एवं भस्त्रिका तथा अनुलोम-विलोम प्राणायाम तीव्रगतिसे कर सकते हैं । इस अभ्याससे चंचल वृत्तियोंको स्थिरता   प्रदान करनेमें सहायता मिलेगी । इसीलिए थोड़े आसन और लयबद्ध ढंगसे प्राणायाम करना भी सिखना चाहिए । योगमुद्रा भी सही ढंगसे दस मिनट पर्यन्त करेंगे तो उससे भी स्थिरतामें सहायता मिलेगी । आसन, प्राणायाम एवं मुद्राएँ तो सहयता ही कर सकती है । वास्तवमें श्री राजजीका अनुभव तो प्रेमसे ही होगा । इसलिए श्री प्राणनाथजी कहते हैं,
निस दिन ग्रहिए प्रेमसों, श्री युगल स्वरूपके चरण ।
निर्मल होना याहीसों, और धाम वरनन ।।
 
निजानन्दाचार्य श्री देवचन्द्रजी महाराज ध्यानमें सदैव श्री राजजीका अनुभव करते थे और परमधाममें विचरण भी करते थे । उनको सदैव श्रीराजजीके सान्निध्यका अनुभव होता था । उन्होंने ध्यानके लिए ध्यानकक्ष बनाया था । वहाँपर ध्यान करते हुए वे श्रीराजजीके साथकी विभिन्न लीलाओंका नित्य अनुभव एवं दर्शन करते थे । महामति श्री प्राणनाथजीने भी सर्वप्रथम ध्यानमें ही श्रीश्यामाजी, श्रीराजजी एवं ब्रह्मात्माओंके दर्शन किए और रास लालीका अनुभव किया । इसी प्रकार उन्होंने श्रीराजश्यामाजीके स्वरूप, सिनगार, लीलाएँ एवं परमधामके दर्शन किए और उनका वर्णन किया । सद्गुरुने तो श्री यमुनाजीका प्राकट्य भी किया । इसी प्रकार श्री लालदासजी, जुगलदासजी जैसे अनेक ब्रह्ममुनियोंको ध्यानमें श्रीराजश्यामाजी एवं परमधामके दर्शन होते थे । इसी प्रकार कतिपय परवर्ती सन्तोंको भी श्रीराजजीके अनुभव हुए हैं ।
 
श्री कृष्णप्रणामी धर्ममें ध्यानके साथ साथ चितवनीका भी विशेष महत्त्व है । परमधामकी विभिन्न लीलाओंके चिन्तनको चितवनी कहा गया है । श्री कृष्ण प्रणामी धर्मकी अष्टप्रहर सेवा पूजा चितवनी ही है । उसमें भी प्रातःकालीन सेवापूजा परमधाम लीला एवं सायंकालीन सेवापूजा व्रज, रास एवं जागनी लीलाकी चितवनी है । सेवा पूजाका गायन करते हुए उन लीलाओंका प्रेमपूर्वक चिन्तन करेंगे तो उन लीलाओमें स्वयंके सम्मिलित होनेका अनुभव होगा । ध्यान और चितवनीमें सफल सुन्दरसाथकी स्थितिका वर्णन करते हुए महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं,
खाते पीते उठते बैठते, सोवत सुपन जाग्रत ।
दम न छोड़े मासूक सों, जाकी असल हक निसबत ।।
 
ऐसी आत्माएँ खाते हुए, पीते हुए, उठते हुए, बैठते हुए, सोते हुए तथा      जागते हुए सदैव अपने धनीके साथका अनुभव करती हैं । उन्होंने ही यथार्थमें अपने धनीके साथके सम्बन्धकी पहचान की है । सुन्दरसाथजी ! हम ऐसा प्रयत्न अवश्य करें कि जिससे हमारा ध्यान सदैव श्रीराजजीमें बना रहे । भौतिक वस्तुएँ जितनी भी मिलेंगी वास्तवमें वे नश्वर ही रहेंगी । इसलिए श्रीराजजीका ध्यान छोड़कर भौतिक वस्तुओंकी ओर ध्यान लगाना अज्ञानता ही कहलायेगी । अतः एव हम तारतम ज्ञानके द्वारा इस रहस्यको समझ कर प्रेमलक्षणा भक्तिके द्वारा श्रीराजजीके चरणोंमें ध्यान लगाते हुए उनका अनुभव करें । इसीमें जीवनकी सार्थकता है ।
 

Desires and Desirelessness

 

One of the greatest plagues of human beings is our insatiable desires. We truly never feel satisfied. We never feel that we have had "enough." We are always looking for more and more and more. This pertains to almost every area of our lives. Obesity, diabetes and heart disease are sky-rocketing because we always want "just one more" ladoo, gulabjamun or piece of chocolate cake. Our bank accounts are getting fuller but our lives are getting emptier because we are always striving to close "just one more deal" or to take on "just one more project", thereby sacrificing the precious time that we could otherwise spend on spiritual pursuits or with our families or engaged in service for others. Talking to my young friends around the world I hear about their boyfriends and girlfriends, who seem to change by the month! "He was nice but he was not smart enough." "She was sweet but not as beautiful as I would like." "He was perfect but half an inch too short."

Families with 4 people have 5 mercedes in the driveway! Everyone has only two feet, yet I know people with hundreds of pairs of shoes. We have one body, but closets full of clothes. What is the need? Nothing other than the futile attempt to satiate our desires.

There is a beautiful line in one of the prayers we sing each morning. It says,

Zindiggi ki dora saunpa, haath Dinaanaath-ke
Mahalon me rakhe chahe, jhopri me vasa de

Dhanyavad nirvivad Rama-Rama kahiye
Jahi vidhi rakhe Rama, tahi vidhi rahiye.


It means, Surrender your life to God. Give Him the reins to your chariot. Wherever He leads you, be happy. Whether He puts you in a palace or a shack, just stay there and be thankful. Be always grateful to the Lord, without any argument and without any doubt. Be happy, ever happy, in whatever condition He keeps you.

This is the only way to live. It is through surrendering to Him that we become desireless. Through being desireless we attain peace and joy. We think, mistakenly, that it is by fulfilling our desires that we will attain joy. However, it is the opposite. Fulfillment of desire leads to temporary happiness NOT because the object of desire was attained, but simply because the desire has now temporarily disappeared! If I am craving a new car and I get a new car, then my desire for a new car has gone away. It is not the new car itself that gives me the joy, but rather it is the fact that I am now free of the desire for a new car. The diminishment of desire is what brings joy to us. But the way to diminish our desires is not to rush around and try to fulfill them. There are always more. They are like weeds in the garden of our mind. No matter how many we pluck, there will always be more… For a short while we are satisfied, and then the fire of desire begins burning again.

I remember when I was on my first trip to the United States, over 25 years ago, and I was staying in Los Angeles. The family I was staying with had a beautiful Rolls-Royce car. We were driving in the Rolls-Royce car one day and the man said to me urgently, "Swamiji, look, look, do you see that car?" He frantically pointed out a car driving near us on the freeway and made sure that I knew which one he was showing me. As we were in the middle of serious conversation on another topic at the time, he did not elaborate further. However, later when we returned home, he said to me, "Swamiji, I need your blessings. Do you remember that car I showed you as we were driving? That is the model of Rolls-Royce I want. Please bless me that I can get that model of Rolls-Royce." I was amazed! Here we were sitting in a Rolls-Royce and he is dreaming about a different Rolls-Royce! But, the truth is, life is always like that.

We must renounce our desires. That doesn't mean renounce enjoyment or renounce possessions. Rather, it means savor everything. Enjoy whatever God gives you, as much as He gives you, however He gives it, and wherever He gives it. Use whatever you have for the benefit of the world. Rest peacefully in the realization that you have exactly as much as God wants you to have right now. You are in exactly the place and exactly the position where He wants you. Do not let your life go to waste always thinking, "If only I had that, then I would be happy." Wherever God is, that is where true richness is.

Look at Hanuman - after the war in Lanka, Ma Sitaji presented Hanumanji with a beautiful, precious pearl necklace. Hanumanji proceeded to carefully examine each and every pearl - from top to bottom, from left to right. Then, he began to take the pearls off the string, one by one, bite them in half, again examine them thoroughly, and then throw them on the ground. Ma Sitaji could not watch this. Finally she said, "Hanuman - what are you doing? That is a very expensive, precious necklace I have bought for you. Why are you pulling off the pearls and breaking them?"

Hanumanji replied, "I am looking for Rama. You have said these pearls are priceless and precious. If so, they must have Rama inside them." Pearls (and diamonds and rubies and cars and money) are only precious if they are filled with God. If God is not there, it doesn't matter how expensive the diamond is, it is still empty and useless. God's presence in your life can turn stones to diamonds, but without God your diamonds are as worthless as stones.

So, let us vow that we will desire God and only God. Where He is, everything is. And let us vow not to waste any more precious moments of life in the endless and futile pursuit for more and more pleasures and more possessions.

May God bless you all.

 

Seva and Sadhana - The Paths to the Divine

 

According to traditional Indian philosophy there are three main paths to the Divine or "yogas", described in compelling detail by Lord Krishna in the Bhagavad Gita:

  • The path of knowledge, or "gyan yoga",
  • The path of righteous action or "karma yoga" and
  • The path of devotion or "bhakti yoga."


For the purpose of this article I want to discuss the latter two - karma and bhakti yoga.  Are we better off sitting still and meditating upon the Divine, chanting His name and endeavoring to experience our inherent Oneness with Him, or are we better getting up and selflessly serving His creation? This question arises quite frequently on the spiritual path -- which is more important, sadhana or seva?  Will I attain enlightenment, liberation, moksha or the state of Divine Bliss faster in lotus posture with eyes closed or with eyes open, hands working?

Or, is there really any true difference between the two? Are they really 2 distinct paths?

There is a wonderful story of a devoted man who spent a great deal of time each day in meditation and prayer. One day in his meditation he heard God's voice commanding him, "There is a large boulder in the field just opposite your house. I want you to push that boulder with all your might."  So the man immediately rose and went into the field. He pushed and pushed, perspired and perspired, but the boulder didn't budge.  Finally, exhausted under a sky long since dark, he returned home. The following morning before sunrise, eager to complete the Lord's bidding, he was out in the field again, pushing and pushing. Still the huge boulder moved not an inch. This went on for many days, and then the days became weeks and the weeks became months. Still the boulder was firm.

Finally, one day the man collapsed in despair. He called out loudly, his voice choking with tears, "My Lord, I have failed You. You gave me such a simple task and even that I was unable to fulfill. I am useless and worthless of Your favor.  Please forgive me."

The Lord responded lovingly, "My child. I never asked you to move the boulder. I put it there, and thus I am well aware that it cannot be moved by human might.  All I asked was that you push against it. In pushing against that boulder for the last several weeks, look at how your arms and legs have strengthened. Do you see the firm muscles where loose flesh had hung before?  Look at how healthy your sallow skin tone has become. There is a shine on your skin now, strength in your step, firmness and flexibility in your body.  This task was not about moving the rock. It was about molding you. If I wanted the rock moved I would have moved it Myself. What I wanted was for you to experience physical labor, for you to feel the sun shine upon your skin, for you to know the fatigue of a hard days' work and for you to see how much more potential your body has than what you had imagined."

Many times we mistake the meaning of seva. We think it is about the end, about the goal, about success.  We see it as a task before us that we undertake with the feeling of generosity or devotion. However, seva is purely sadhana in an active form.  Seva serves two specific purposes, aside from the actual benefit to the poor of the schools, hospitals, orphanages we may build.  The first benefit is it teaches and trains us to see the Divine in all. Seva is not about "us" serving "them." It is not about "we" who are privileged giving to "them" who are disadvantaged. Seva is a practice of seeing them as us.  Every religion in the world teaches us that we are all One. Hinduism says, "Vasudhaiv  Kutumbakam" (the world is one family). Christianity says, "Love thy neighbor as thyself." This does not mean that I love cookies so I should feed my neighbor cookies. In order to truly, deeply and fully love another being as myself I must see that person as myself and see myself in them. Otherwise, we can never love another as much or in the same way as we love ourselves. The only way is to see the other as self.

The word "yoga" literally means "union." It is a union of the self to the Divine. Whether one walks the path of Karma Yoga, Bhakti Yoga, Gyan Yoga or practices Mantra Yoga or Siddhi Yoga or Laya Yoga or Raja Yoga, it doesn't matter.  The destination is the same. They are all "Yoga" or practices of union.  In each of these practices we are striving to realize the Union of ourselves with the Divine, and the moment we have a glimpse of union with the Divine, immediately we realize a union with all of creation. God is not partial. God would never say, "I'll be One with you and you, but not with you."  The scriptures implore us to realize that we are One with God, and they never say, "But only if your name is included at the end of this book."  No, we are all One with the Divine, and if we are all One with God then, by definition, we are One with each other.  If A=B and B=C, then by definition A=C. So, if I am One with God and you are One with God then you and I are One with each other.

That Oneness with the Divine and through the Divine with all of creation is the fruit of true sadhana. So when we serve others in seva, when we work for the benefit of the world, on any level, through any means, the goal is not about the particular fulfillment of a project. The goal is to see the Divine in all whom we are serving - whether a child, a woman, a patient, a cow or a river. When we see the Divine in those whom we are serving then of course we will work with sincerity, with focus, with attention, with dedication and with commitment. After all, we are serving God. We are serving the true Self.

The other important aspect of seva is how it shapes us. Like the man in the story, seva is what tunes us and tones us, not just the body - the mind, the thoughts, the ego.  It is one thing to sit in meditation and feel egoless; it is another to serve in the world with no ego. It is one thing to find a state of peace and stillness of the mind sitting silently in a forest or temple. It is quite another to find that same state of peace and stillness in the midst of a major seva project.  That is the goal.  The joy, peace, oneness, and divine connection we feel in meditation and prayer is what we carry with us into the day of seva. Just as we see the Divine in the images in our temple, can we see the same Divine in everyone with whom we interact, in everyone and everything for whom and with whom we are serving?

So, seva and sadhana, karma yoga and bhakti yoga go hand in hand, and -- in the higher levels of awareness -- merge into one.  After all, is loving someone any different from bringing him/her a cup of tea? Is loving someone any different from wiping his/her feverish brow? Of course not. There is no way to determine where love ends and service begins.  When the love is true and pure, service is the most natural outcome.  Hence, when the sadhana is true, seva is the natural extension of it. Conversely, through seva we attain a state of love and unity which deepens and enriches our sadhana. Slowly, slowly we realize they are simply two sides of the same coin, two streams meandering and merging together into the great Ocean.


 

The Time for a Spiritual Life is Now

 

There was once a disciple of a Guru who went to his Guru and said, "Guruji, I want to live a spiritual life. I want to live in the service of God. I want to go beyond the binding chains of this mundane, materialistic world. But, I feel that I am not quite ready. My desires for a family, for wealth and enjoyment are still too strong. Grant me some time to fulfill these wishes and then I will come to your holy feet."


So the Guru said, "No problem, my child. Go. Get married, have a family and earn wealth. In ten years I will come back for you. My blessings are with you."


With the blessings of his Guru, the man went out and quickly found a beautiful girl to marry. They had 3 beautiful children, and the man became financially successful.


After 10 years, there was a knock on the door of their home. The man's wife opened it to see a haggard-looking beggar standing on the doorstep. The beggar asked to see her husband. At first she started scolding the beggar, thinking that he was just there to beg for money. But, the husband realized that the beggar was his Guru in the disguise of a beggar, so he lovingly invited him inside.


"I have come to take you away from this world of illusions now that you have fulfilled your desire of having a wife, family and earnings. Come with me, my son, let me show you the way to God," the Guru said to his disciple.


But, the man looked at his Guru pitifully and he said, "Dear, Beloved, Guru. Yes,  you are right. You have given me my 10 years ever so generously, and with your blessings I have prospered beyond my imagination. But, my children are very young and my wife is again with child. She would not be able to handle the burden of all of them alone. Allow me to stay another ten years until the children are old enough to care for themselves."


A true Guru will guide you to the path, show you the light and help when help is requested, but will never force a disciple -- against the disciple's will -- to follow any particular path. Thus, the man's Guru compassionately agreed, saying, "So be it, my son. Stay another 10 years until you feel that your mission is fulfilled."


Ten years later, the Guru returned to the home to find a large bull-dog out front guarding the house. Immediately he recognized his disciple in the dog and saw -- with his divine vision -- that the man had passed away several years prior due to a heart attack.  Due to the man's intense attachment to his family and wealth, he had reincarnated as a guard dog. The Guru put his hand on the dog's head and said, "My child, now that you have regressed from a human to a dog due to your attachment to these worldly things, are you finally ready to come with me?" The dog licked the hand of his Guru lovingly and said, "My beloved Guruji. You are right that it is my own attachment which has driven me to take birth as a dog, but you see my children have many enemies who are envious of their wealth and power. These enemies are very dangerous to my children and I must stay here to protect them. However, I am sure that within a few years everything will sort itself out and they will be fine. Give me just seven more years to protect them, then I am yours."


The Guru left and returned 7 years later.


This time, there was no dog out front and the home was filled with grandchildren running around. The Guru closed his eyes and saw with his divine vision that his disciple had taken birth in the form of a cobra, wedged into the wall near the family safe to guard the money. He called the grandchildren of the house: "My children," he said. "In the wall to the right of your safe, there is a cobra curled up in a small nook. Go there and bring the cobra to me. Do not kill it. It will not harm you, I promise. But, just break its back with a stick and then bring it to me." The children were incredulous, but went to the wall where the old man had directed them. Amazed,  they saw that -- just as the Guru had said -- a cobra was curled up in the wall. Following his orders, they broke the cobra's back and carried it outside to the Guru. The Guru thanked the children, threw the cobra over his neck and left.


As he walked away carrying the cobra over his neck, the Guru spoke to the cobra, injured and aching, "My child, I am sorry for hurting you, but there was no other way. Twenty seven years and three births ago you left to taste the material world of sensual pleasures. But the ways of Maya are so alluring and so subtle that they trap us instantly. You have wasted these lifetimes in the futile pursuit of material success and in attachment to people who also are only actors in the Cosmic Drama. My child, all here is Maya - Cosmic Illusion. It lures us into its trap, convincing us that it is real, permanent, everlasting and significant. But, in reality, the only thing which is real is Him, and the only true purpose of life is to get close to Him. These attachments merely divert our attention and focus away from the true purpose of life. I had no choice but to come to your rescue as I saw you sinking deeper and deeper into the deep clutches of Maya."


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So frequently in life we think, "Just one more year" then I will cut back on my luxuries and cut back on my time at the office. "Just one more year" and I will dedicate more time to meditation and spiritual pursuits. "Just one more year" and then I will go to India, sit at my Guru's feet and delve into the divine depths of spirituality. "Just one more year" and then I will cut down on my sensual pleasures."....and on and on. But, that "one more year" never comes. Our intentions are good. We want to be more spiritual. We want to devote more time to spiritual pursuits. We want to spend less, need less and serve more. We want to be the master over our lust, anger and greed rather than vice versa. But, the power of Maya is stronger than the power of our will. Thus, we continue to find excuses for why we must continue to work 50 or 60 hour work-weeks, why we still have no time for meditation, why we can't squeeze a visit to the holy places of India into our year's planning, and why we continue to run after temporary sensual pursuits.


The only way to break free from the veil of illusion that Maya wraps around our minds is to surrender to God and beg Him to show us the true light. The only way to break free is to make AND STICK TO concrete vows of how we are going to be better people.. Rather than saying "I will find time to meditate" we must say "I will not leave for work without sitting in meditation and I will not sleep at night without doing my nightly introspection." Rather than saying, "I will try to come to India and visit holy places whenever I can," we must say "I will take my vacation this year in India and nowhere else." Rather than say, "I will try to cut back on my expenses so that my financial needs are less," we must say, "I will not buy another jacket or pair of shoes [or anything] until the ones that I have are broken, torn or no longer fit me." Rather than say, "I will try to overcome my anger, lust and greed," we must commit to having daily appointments with God in which we introspect on all the times we allowed ourselves to be overpowered by these emotions and we must pray for strength, DAILY, to be remain calm, peaceful and sattvic in our lives."


If we wait for the right time, that time will never come. The only time is now.


May God bless you all with the clarity of vision to realize that the external world is Maya and with the strength, fortitude and dedication to remove the veil and attain the Divine Truth.


May God bless you all.