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सदा सुख दाता धामधनी
जगद्गुरु आचार्य श्री १०८ कृष्णमणिजी महाराज


धामके धनी पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजी सदैव सुख प्रदान करते हैं इसलिए उनको सुखदाता कहा है । वे दयालु हैं, कृपालु हैं, आनन्ददाता हैं । यहाँ पर सुखका तात्पर्य परम सुख अर्थात् आनन्दसे है । शास्त्रोंमें भी इसी प्रकारका उल्लेख है, आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् अर्थात् आनन्दको ही ब्रह्म समझो, ब्रह्म आनन्द स्वरूप है ।


फिर दुःख क्यों ?


सामान्यजनकी जिज्ञाासा होती है कि जब परमात्मा आनन्द दाता हैं तो मनुष्यको दुःख क्यों प्राप्त होते हैं । इसपर मनन करनेपर ज्ञाात होता है कि मनुष्य अज्ञाानताके कारण गुण अंग इन्द्रियोंके वशीभूत होकर परमात्माकी दी हुई बुद्धिका दुरूपयोग कर हेय (बुरे) कार्य करते हैं और उनके परिणाम स्वरूप दुःख प्राप्त करते हैं । महामति श्री प्राणनाथजी दूसरे स्थानपर भी कहते हैं, खुदा न देवें दुःख किन को अर्थात् परमात्मा किसीको भी दुःख नहीं देते हैं किन्तु मनुष्य ही अज्ञाानवश अपने कर्मोंका फल भोगते हैं ।


कर्मफल भी देश, काल और परिस्थितिके अधीन ः


कर्म भी देश, काल और परिस्थितिके अनुरूप श्रेय और हेय फल देता है । कोई दुष्ट व्यक्ति किसी मनुष्य या अन्य प्राणीको व्यर्थमें मार रहा होता है तो ऐसे समयपर सत्य बोलकर उसे मरवाना दोष कहलाता है और झूठ बोलकर उसे बचाना गुण कहलाता है । इसी प्रकार अन्य कर्मोंको भी समझना चाहिए । कर्मका श्रेय और हेय फल प्रदानमें बड.ा ही सूक्ष्म भेद होता है जो सामान्य व्यक्तिकी समझसे बाहर है । श्री कृष्णजीने गीता ४/६में श्रेष्ठकर्मों(कर्म एवं अकर्म)का अन्तर समझनेमें भी कठिनाई बताई है, किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।


इसलिए कर्मके चयनमें विवेक होना अति आवश्यक है । सत्यको सत्य और मिथ्याको मिथ्या(झूठ) समझनेकी क्षमता जब बुद्धिमें विकसित होती है उसीको विवेक कहा गया है । यह क्षमता सदैव सत्यका संग अर्थात् सत्संग करनेसे प्राप्त होती है । श्रीमद्भागवत माहात्म्य (२/७६)में कहा है, भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन सत्संगमं च लभते पुरुषो यदा वै ।


अज्ञाानहेतुकृतमोहमदान्धकारनाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः।।


अनेक जन्मोंमें किए गए श्रेय कार्य संचित होकर भाग्यके रूपमें उपस्थित होते हैं । जब मनुष्यके भाग्यका उदय हो जाता है तब वह सत्संगका अवसर प्राप्त करता है । सत्संगसे प्राप्त ज्ञाानकेद्वारा उसकी बुद्धिमें स्थित अज्ञाान जनित मोह एवं मदरूपी अन्धकार नाश होनेपर विवेकका उदय होता है । विवेकके उदय होनेपर ही बुद्धि सत्यको सत्य एवं मिथ्याको मिथ्या समझने लगेगी । तब मनुष्य देश, काल और परिस्थितिके अनुरूप श्रेष्ठ कर्म करने लगेगा ।


श्रेय और हेय कर्मका ज्ञाान न होने पर क्या करना चाहिए ?


अब यह जिज्ञाासा उत्पन्न होगी कि सभी मनुष्योंके अन्दर श्रेय या हेय कर्मको समझनेकी क्षमता नहीं होती है तो उन्हें कर्तव्यका निर्णय कैसे करना चाहिए ? इसके लिए कहा गया है कि वे सन्त गुरुजनोंका संग करें, उनके उपदेशोंको समझकर, शास्त्र वचन अर्थात् शास्त्रोंपर आधारित सत् साहित्यका अध्ययन मनन कर अपनी बुद्धिको परिमार्जित करें अथवा निरन्तर गुरुजनोंके सम्पर्कमें रहकर उनके मार्गदर्शनमें कार्य करें । समझदार लोगोनें ऐसी परिस्थितिमें किस प्रकार कार्य किया है उस पर विचार कर स्वयं भी तद्अनुरूप चलें । यदि उपर्युक्त कोई भी उपाय सम्भव नहीं हैं फिर भी आप श्रेय एवं हेय(भला-बुरा) कार्यपर निर्णय करना चाहते हैं तो कृपया ध्यान दें, यदि आपकी श्रद्धा या भक्ति पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री राजजीके प्रति दृढ. है तो आप उनके चरणोंमें प्रार्थना कर उन पर ही निर्णय छोड. दें और कहें, हे धामधनी ! मेरे लिए जो श्रेष्ठ है उसकी ओर मुझे ले जायें । हृदयमें कपट भाव न हो और भक्ति प्रधान व्यक्ति हो तो श्री राजजीके चरणोंमें समर्पित होनेपर पूर्णब्रह्म परमात्मा उस व्यक्तिको अवश्यमेव सत् कार्यकी ओर ही प्रेरित करेंगे । बुद्धि प्रधान व्यक्तिको परमात्माकी प्रेरणाका ज्ञाान नहीं भी हो सकता है और उससे भूल हो सकती है । इसलिए भक्ति प्रधान व्यक्तिके लिए ही यह उपाय है । बुद्धि प्रधान व्यक्तिको तो सदैव खोज करनी पड.ेगी । सामान्यतया श्रेय और हेय कर्मपर निर्णय करना बड.ा ही जटिल होता है । परमात्माने सभी व्यक्तिको बुद्धि प्रदान की है इसलिए प्रत्येक व्यक्तिको उसका सदुपयोग करना चाहिए और सदैव अच्छे, समझदार एवं विवेकी व्यक्ति या गुरुजनोंके सम्पर्कमें रहना चाहिए । बुद्धिके परिष्कारके लिए ही तो सारे शास्त्र हैं । शास्त्र अध्ययन या साधनासे बुद्धिको शुद्ध कर सकते हैं । शास्त्र अध्ययन, साधना एवं सत्संग तीनों हों तो कहना ही क्या ? ऐसा मनुष्य सदैव सत्कार्यकी ओर ही प्रवृत्त होगा । शुद्ध हृदयवाले भक्तके लिए तो सर्वत्र सरल है क्योंकि उसका सम्पूर्ण दायित्व परमात्मा स्वयं अपने ऊपर ले लेते हैं ।
उपर्युक्त सम्पूर्ण कथनोंसे यह नितराम् स्पष्ट हो जाता है कि परमात्मा सदैव कृपालु होते हैं, वे किसीको भी दुःख नहीं देते हैं । मनुष्य अपनी बुद्धिका सदुपयोग न करनेसे एवं परमात्माके प्रति पूर्णतः समर्पित न होनेसे ही हेय कर्मका आश्रय लेकर दुःख प्राप्त करते हैं । इसीलिए महामति कहते हैं, सदा सुख दाता धाम धनी अर्थात् धामधनी श्री राजजी सदैव सुखदाता हैं, दयालु हैं, कृपालु हैं । विचार करेंगे तो ज्ञाात होगा कि यथार्थमें धामधनी सदैव सुख ही प्रदान करते हैं, वे कभी भी दुःख नहीं देते हैं । मायाके प्रभावके कारण हमें परमात्माके गुणोंका ज्ञाान नहीं होता है और हम मायाके गुणोंकी भांति परमात्माके गुणोंका भी मूल्याङ्कन करने बैठते हैं । यथार्थमें यही हमारी सबसे बड.ी भूल है ।


धाम धनीका अनुग्रह ः


सर्वप्रथम हमें अपने धनीके अनुग्रहकी ओर ध्यान देना चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि वे अपनी आत्माओंके प्रति सदैव अनुग्रह ही करते हैं । महामति श्री प्राणनाथजी कहते हैं, ए खेल हुआ मेहेर वास्ते अर्थात् श्री राजजीने अपनी आत्माओंके प्रति परम अनुग्रह कर अक्षर ब्रह्मके द्वारा इस सृष्टिकी रचना करवायी है । यद्यपि अक्षर ब्रह्मका स्वभाव ही खेल बनानेका है और वे ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि, स्थिति और लय करनेवाले हैं तथापि श्री राजजीने उनपर एवं ब्रह्मात्माओंपर परमकृपा कर अक्षरब्रह्मके अन्य खेलोंकी अपेक्षा इस खेलमें कुछ विशेषतायें बनवायी हैं ।


अक्षरब्रह्म पर अनुग्रह इस प्रकार किया कि धामधनी एवं ब्रह्मात्माओंकी लीलायें देखनेकी उनकी अभिलाषाकी पूर्तिके लिए अक्षरब्रह्मको कहा, मैं तुम्हारे खेलके अन्दर ही अर्थात् मायामें ही तुम्हें अपनी लीलाओंके दर्शन करवाऊंगा । इतना सुनते ही अक्षरब्रह्मने अपने खेलमें विशेषतायें बढ.ाई और अपना सम्पूर्ण ध्यान खेलमें ही लगाया । इस प्रकार अक्षरब्रह्मने श्री राजजी एवं ब्रह्मात्माओंकी लीलाओंके एक एक दृश्यको अपने स्मृति पटल पर अंकित किया जिससे इस मायाके अन्दर सम्पन्न हुई ब्राह्मी लीला अखण्ड हो गई । धामधनी एवं ब्रह्मआत्माओंकी लीलाओंके दर्शनके लिए अक्षरब्रह्मको कुछ अधिक कार्य करने नहीं पड.े अपितु अपने ही खेलको उन्होंने ध्यानपूर्वक देखा ।


दूसरी ओर ब्रह्मात्माओं पर उन्होंने इस प्रकार अनुग्रह किया कि अक्षरब्रह्मका खेल देखनेकी उनकी इच्छाको अपने चरणोंमें बैठाए हुए ही पूर्ण किया । इसके लिए ब्रह्मात्माओंको कहीं भी जाना नहीं पड.ा अपितु वे मूलमिलावामें ही अपने धनीके चरणोंमें बैठकर मायाका खेल देखने लगी । यद्यपि परमधाममें मायाके दर्शन सम्भव नहीं है तथापि धामधनीने ऐसी व्यवस्था करवायी कि ब्रह्मात्माओंने अपने धनीके चरणोंमें बैठे बैठे मायाके खेलके दर्शन किए ।
किन्तु यह बहुत बड.ी विडम्बना है कि ब्रह्मात्मायें खेल देखते देखते स्वयंको भूल गई, अपने धनीको भूल गई और अपने धामको भी भूल गई । यह श्री राजजीका ही सामर्थ्य है कि वे अपनी आत्माओंको अपने ही चरणोंमें बैठाकर खेल दिखा रहे हैं तथापि ब्रह्मात्माओंको खेल देखते हुए ऐसा अनुभव हो रहा है कि वे श्री राजजीसे दूर हैं और उनका सम्बन्ध भी श्री राजजीके साथ कभी नहीं था । इसीलिए महामति कहते हैं, सदा सुख दाता धाम धनी, अंगना तेरी जोड ।


जानो सनमन्ध कबूं ना हुतो, ऐसा किया बिछोड ।।
(खिलवत १/६)


हे धामधनी ! आपकी अंगनायें आपके चरणोंमें आपके साथ ही अति निकट बैठी हुई हैं तथापि खेल देखते हुए ऐसा अनुभव कर रही हैं कि वे आपसे बहुत दूर हैं, उन्हें आपका कोई भी ज्ञाान नहीं है और आपके साथ उनका किसी भी प्रकारका कोई भी सम्बन्ध नहीं है और कभी था भी नहीं तथापि आप उन पर अनुग्रह कर उन्हें तारतम ज्ञाानके द्वारा जगा रहे हैं और प्रेम लक्षणा भक्तिके द्वारा अपने सान्निध्यका अनुभव करवा रहे हैं महामति धामधनीको सदा सुख दाता क्यों कह रहे हैं और धामधनीने अपनी आत्माओंको मायाका खेल दिखाकर किस प्रकार अनुग्रह किया ? अब इस पर विचार करें । यदि किसी बड.े तालावमें रहनेवाली मछलीको किसीनेे पानीसे बाहर निकाल कर थोड.े समयके लिए तपी हुई रेतमें रख दिया और थोड..े समय पश्चात् उसे पुनः पानीमें डाल दिया तो पानीमें प्रवेश करनेपर उस मछलीकी स्थिति कैसी बनी होगी ? जब तक वह रेतमें तप रही थी तब तक छटपटा रही थी किन्तु पानीमें प्रवेश करते ही उसे उस पानीसे इतना सुख मिला और उसने पानीमें ऐसी छलांग लगाई जो अभीतक कभी भी नहीं लगाई थी । वह जन्मसे लेकर अभीतक उसी पानीमें थी किन्तु थोड.ी देर बाहर रहकर जब पुनः पानीमें गई तब उसे पानीका असली स्वाद प्राप्त हुआ जो स्वाद उसने अभीतक कभी प्राप्त नहीं किया था । इसी प्रकार ब्रह्मात्मायें भी मायाका खेल देखकर जब श्री राजजीके चरणोंमें जागृत होंगी तब उन्हें श्री राजजीके प्रेमका जो स्वाद प्राप्त होगा वह उन्होंने अभीतक प्राप्त नहीं किया था । क्या यह श्री राजजीकी कृपा नहीं है ?


इस उदाहरण पर और ध्यान दें । मछलीको पानीका असली स्वाद जाननेके लिए पानीसे बाहर जाना पड.ा किन्तु ब्रह्मात्माओंको मायाका खेल देखनेके लिए परमधामसे एवं श्री राजजीके चरणोंसे दूर जाना नहीं पड.ा । उनको श्री राजजीने अपने चरणोंसे दूर भी नहीं किया और मायाके सुख दुःख भी दिखा दिए । दूसरी बात मछली तो पानीसे बाहर रहकर गरम रेतमें तपती रही, पुनः पानीमें प्रवेश करनेपर ही उसे पानीका असली स्वाद प्राप्त हुआ किन्तु ब्रह्मात्माओंको तो श्री राजजीके चरणोंको छोड.कर परमधामसे बाहर तो जाना नहीं पड.ा साथमें उनको मछलीकी भांति तपना भी नहीं पड.ा । क्योंकि मायाका खेल दिखाते हुए भी श्री राजजी उन्हें तारतम ज्ञाान एवं प्रेम लक्षणा भक्ति प्रदान कर सचेत कर रहे हैं । मायाका ज्ञाान भी करवा रहे हैं और अपने मूल सम्बन्धकी पहचान भी करवा रहे हैं । इससे आगे बढ.कर उन्होंने प्रेमलक्षणा भक्ति प्रदान की जिससे मायाका खेल देखते हुए भी ब्रह्मात्मायें अपने धनीके सान्निध्यका अनुभव कर सकें अर्थात् हर पल हर घड.ी श्री राजजीके साथ साथ होनेका अनुभव कर सकें । यही तो धामधनी श्री राजजीका है ।


बस, हमें इसी अनुग्रहका अनुभव करना है । यह माया तो देखनेके लिए है भोगनेके लिए नहीं । धामधनी हमें मायाका खेल दिखा रहे हैं किन्तु हम ही अज्ञाानी बनकर खेल देखनेकी अपेक्षा मायामें ही डूब रहे हैं । जब तक मायामें डूबे रहेंगे तब तक धामधनीको दोष देते रहेंगे । जब तारतम ज्ञाानद्वारा जागृत होकर एवं प्रेमलक्षणा भक्तिद्वारा श्री राजजीके सान्निध्यका अनुभव करते हुए मायाका खेल देखने लगेंगे तब हमें सर्वत्र धामधनीके अनुग्रहके दर्शन होंगे और हम कह सकेंगे कि हमारे धामधनी वास्तवमें दयालु हैं, सुख दाता हैं, आनन्द दाता हैं । तब हम पुकारने लगेंगे,


सदा सुख दाता धामधनी, मैं कहा कहूँ इन बात ।.
महामति जुगल स्वरूप पर, अंगना बलि बलि जात ।।